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बस्तर गोंचा पर्व में गोंचा रथ यात्रा विधान सालों से जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर विराजित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा पुरे देश में उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाई जाती है। बस्तर में गोंचा पर्व भगवान श्री जगन्नाथ व देवी सुभद्रा और दाउ बलराम के रथ यात्रा का पर्व है। इस पर्व को प्रति वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से लेकर एकादशी तक पूरे 27 दिनों तक बस्तर वासियों के द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। बस्तर के जगदलपुर नगर में मनाए जाने वाले रथयात्रा पर्व एक अलग ही परंपरा, एक अलग ही संस्कृति देखने को मिलती है। सामान्यतः विशालकाय रथों को परंपरागत तरीकों से फूलों तथा कपड़ों से सजाया जाता है और रथयात्रा पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। गली गली मे जगन्नाथ भगवान के रथ खींचने की होड़ मची रहती है।
आषाढ़ मास में हल्की फ़ुहारो के साथ जय जगन्नाथ जयकारा गुंजता रहता है। जानकारी के मुताबिक रियासतकाल मे ओड़िसा राज्य के जगन्नाथ पूरी के महाराजा ने बस्तर के राजा को रथपति की उपाधि दी थी, जिसके बाद ओड़िसा के बाद बस्तर में गोंचा पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। 27 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में गोंचा के दिन बस्तर में तीन विशालकाय रथों पर सवार भगवान जगन्नाथ, माता सुभद्रा और बलभद्र की रथयात्रा निकाली जाती है।
करीब 615 साल पहले बस्तर के तत्कालीन महाराजा पुरुषोत्तम देव बस्तर से पदयात्रा कर जगन्नाथ पुरी कर गये थे, जिसके बाद पुरी के तत्कालीन महाराजा गजपति द्वारा बस्तर के राजा को रथपति की उपाधी दी गई थी। महाराजा पुरुषोत्तम देव को उनकी भक्ति के फलस्वरूप देवी सुभद्रा का रथ दिया गया था और प्राचीन समय में बस्तर के महाराजा रथ यात्रा के दौरान इस रथ पर सवार होते थे। तब से ही बस्तर में यह पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है। पंरपरानुसार रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ माता सुभद्रा और बलभद्र को अपने साथ गुंडेचा मंदिर (जनकपुरी ) ले जाकर सात दिनों तक वहां विश्राम करते है। बस्तर के राजकुमार कमलचंद भंजदेव आज भी इस रथयात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ की पूजा पूरे विधि विधान से करते है।
बस्तर में 9 दिनों तक चलने वाले गोंचा पर्व की शुरुआत 3 विशालकाय रथ की परिक्रमा जगदलपुर में भगवान को रथ मे विराजने के साथ होती है। पंरपरानुसार बांस से बनी तुपकी से सलामी दी जाती है। इसके बाद सीरासार भवन जिसे जनकपुरी कहा जाता है, यहां पूरे 9 दिनों तक 360 आरण्यक ब्राह्मण समाज और बस्तर के श्रद्धालुओं के द्वारा हर दिन विशेष पूजा पाठ की जाती है। वहीं इन रस्मों के दौरान 56 भोग लगाने की भी रस्म निभाई जाती है। 9 दिनों तक जगदलपुर शहर का माहौल भक्तिमय हो जाता है और सिर्फ बस्तर ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग इस महापर्व में शामिल होने बस्तर पहुंचते हैं।