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पलायन की प्रक्रिया और सामाजिक स्थिति छत्तीसगढ़ से छत्तीसगढ़िया मजदूरों के पलायन का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। आजकल हो रहे पलायन की बानगी देखने और उसकी गति तथा पद्धति को समझने के लिए धमतरी जिले में किये गये क्षेत्र अध्ययन के आधार पर इसका विश्लेषण किया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ से पलायन करने वाले किस दिशा और दशा में जाते है।
यद्यमि आज के दौर में छत्तीसगढ़ से हो रहे पलायन के सहीं आंकड़े जुटाना अत्यंत कठिन है क्योंकि समस्त छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर अलग- अलग दिशाओं में जाने वाले जत्थों में शामिल लोगों की संख्या ओर सम्बद्ध जानकारियों की उपलब्धि संभव नहीं। यथासंभव अप्रत्यक्ष संकेतों के आधार पर दिशाएं निर्धारित की जा सकती है जिनसे वास्ताविक संख्या ने सही पर उसका एक अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।
धमतरी जिले के विशेष संदर्भ में
धमतरी जिले में 6 लाख 30 हजार 339 लोग मतदाता के रूप में हैं। इनमें से 2 लाख 27 हजार 498 लोग मजदूर हैं। जिनका पंजीयन श्रम विभाग में है। मजदूरों के इस चौंकाने वाले आकड़ों से पता चलता है कि अभी भी लोगों के जीवन स्तर में कोई खास सुधार नहीं आया है और केन्द्र व राजय सरकार की श्रमिक संबंधित योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। इस पंजीकृत संख्या में लगभग 25-30 प्रतिशत फीसदी श्रमिक उत्तर प्रदेश, हैदराबाद, बिहार, ओडिसा, जम्मू कश्मीर, मध्यप्रदेश अन्य राज्यों में पलायन करते हैं।
छत्तीसगढ़ से पलायन करने वालों में महिलाओं की तादाद हमेशा पुरूषों से अधिक होती है। इस हेतु कुछ हद तक विवाह के बाद महिलाओं के रहने की परम्परा भी जिम्मेदार है। प्राय महिलायें अपने परिवार के साथ ही पलायन करती है पर कभी-कभी अलग से भी कमाने जाती है। पलायन करने वालों की सबसे ज्यादा तादाद धमतरी जिले के कुरूद, परखंदा, मगरलोड से होती है। अध्ययन मे किये गये क्षेत्र अध्ययन से भी स्पष्ट संकेत मिलते है कि कुरूद तथा परखंदा व मगरलोड एक ऐसी पट्टी है जिससे सर्वधिक पलायन हुआ करता है।
ऊपरी तौर पर छत्तीसगढ़ से होने वाला पलायन पूर्णतः असंगठित लगता है। यहां तक कि सरकारी अमला भी इस दुष्यक्र के व्यूह को असंगठित मानकर तोड़ने में असमर्थ है। महानदी के मैदानी क्षेत्र की अधिकांश खेती आज भी मौसमी वर्षा पर आधारित है। जिसके भरोसे सिर्फ धान की एक फसल भी तभी संभव होती है, जब वर्षा उचित समय पर समुचित मात्रा में हो। आजकल, दीवाली के बाद, फसल कटाई होते-होते ही भर्ती का काम हो जाता है। पहले जिन केन्द्रों से चाय बागानों, जूट मिलों अथवा कोयला खदानों के लिए मजदूर भर्ती किये जाते थे उन खुराकी का अब अस्तित्व नहीं है। अब बड़े ठेकेदारों के मुंशी और सरदार कहलाने वाले लोग गांव-गांव में घूमकर भर्ती का काम करते हैं। धमतरी के कलेक्टर के कार्यालय में विधिवत एक पंजी कायम है, जिसमें हर साल बाहर से आकर मजदूरों को ले जाने वाले ठेकेदारों के नाम लिखे जाते हैं। इसके बावजूद सभी जानते हैं कि ऐसे ठेकेदारों की कमी नहीं जो बिना लिखा-पढ़ी के ही हर साल सैकड़ों मजदूरों को यहां से ले जाते हैं।
ठेकेदार अथवा उसके मुंशी हर गांव में अपने नुमाइंदे की मार्फत भर्ती करते हैं। यह व्यक्ति जमादार अथवा सिरदार कहलाता है जो ठेकेदार अथवा उसके मुंशी द्वारा बताई गई शर्तों पर मजदूरों को बाहर जाकर काम करने हेतु भर्ती करता है। कई बार बयाना की रकम देकर भर्ती होती है। यह रकम ठेकेदार के यहां जाकर काम करने पर मिलने वाली मजदूरी में से सूद सहित काट ली जाती है। बयाना पेशगी लेने वाले मजदूर ही अपनी रकम अदा न कर पाने पर बंधुवा जीवन जीने को लाचार होते हैं। मूल और उस पर लगातार बढ़ने वाले सूद को छूट पाना प्रायः मजदूरों के लिये असंभव हो जाता है। श्रमिकों के पलायन की समस्या इस तरह बंधुवापन से भी जुड़ जाती है।
सरकार द्वारा हर साल दुहराये जाने वाले बयान के मुताबिक अब छत्तीसगढ़ से मजदूरों को ले जाने का हक सिर्फ पंजीकृत ठेकेदारों को ही है। यह सरकारी व्यवस्था ठेकेदारों को कानूनी हक प्रदान करती है कि वे अपना पंजीयन करवाकर इस क्षेत्र के मजदूरों को अपने यहां ले जायें। धमतरी के कलेक्टर ने ऐसे 29 पंजीकृत ठेकेदारों के नाम बताये जो मजदूरों को वहां से ले जाते हैं। इसके साथ ही एक सर्चा यह भी है कि हर एक पंजीकृत ठेकेदार के साथ कम से कम 5 गैर कानूनी ठेकेदार के जमादार के रुप में धमतरी जिले की कुरूद तहसील से श्रमिकों की भर्ती करने वाले दुबराज नाग ने बताया कि ठेकेदार उसे श्रमिकों की संख्या के हिसाब से उसका कमीशन देने के अलावा श्रम निरीक्षक और पुलिस वालों को मक्खन लगाने का खर्च भी मजदूरों की तादाद के हिसाब से ही दिया करता था।
यात्रा
आजकल छत्तीसगढ़ से पलायन करने वाले श्रमिक प्रायः उत्तर दिशा में जाते है। जहां उत्तरप्रदेश के गंगा तट क्षेत्र की ईट भट्ठों में धमतरी जिले के श्रमिकों को श्रेष्ठ ईट निर्माता माना जाता है। इससे आगे हरियाणा, दिल्ली व पंजाब के निर्माता कार्यों के अलावा जम्मु-कश्मीर तक छत्तीसगढ़ श्रमिक कमाने-खाने के लिये ले जाते हैं। इन श्रमिकों को उत्तर प्रदेश की ईट भट्ठों तक ले जाने के लिए दुर्ग से छपरा तक जाने वाली सारनाथ या दिल्ली तक जाने के लिए छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मे सुविधाजनक रेल यात्रा का इंतिजाम आसान होता है। कुछ बड़े समूहों के सीधे म.प्र.राज्य पथ परिवहन निगम की बसों से भी इलाहाबाद के लिये रायपुर या बिलासपुर से ले जाया जाता है। असमर्थ, गरीब श्रेणी के मजदूरों के कई परिवार थोड़ी सी जगह में भी रेल यात्रा कर लेते है। इनके लिए शयरयान में आरक्षण कराना एक ऐसी विलासिता है जिसका इन्हें कभी भी सुख नहीं मिलता। रेल यात्रा में पुलिस अथवा टीटीई. द्वारा उन्हें कभी भी सुख नहीं मिलता। संकट से उबारने के लिए ठेकेदारों के एजेंट कभी-कभी इनकी तरफ से कुछ घूस भी दे देते हैं। बशर्ते यह कि उनके लायसेंस अथवा कानूनी अधिकार के बाबूत कोई संकट न आये। बिना टिकट के लम्बे यात्रा करते हुये कई बार इन परिवारों को रोंगटे खड़े कर देने वाले अनभवों से भी गुजरना पड़ता है। नैला के पास बघौदा गांव की सविता ने बताया कि एक बार 25 वर्ष की उम्र में वह अपने पति, दो बच्चों व अन्य 40 लोगों के साथ रेल से जा रही थी। ठेकेदार ने पहचान लिये जाने के भय से बिना टिकट मजदूरों को पूरी रेल में अलग-अलग बैठने को कहा। बिलासपुर में जब उसका पति पानी लेने उतरा था तभी बिना टिकट यात्रा करते हुये उसे पुलिस वालों ने पकड़ लिया। उसे थाना ले जाया गया जहां पूछताछ के बहाने उससे कुछ रकम ऐंठने की कोशिश की गई। चूंकि इसके पास पुलिस को देने के लिए एक लोटे के अलावा कुछ भी न था। अतः उसे 3 हप्तों तक के लिए बिना टिकट यात्रा के जुर्म पर जेल भेज दिया गया। इस बीच अपने बच्चों का साथ लेकर सुविता गोंडा पहुँच गई थी। किसी तरह उसने एक महीने तक का समय बिताया तब कहीं उसका पति जेल में छूटने पर गोंडा जाकर उससे मिला। ये घटना यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि छत्तीसगढ़ के मजदूरों को पलायन कराकर ले जाने वाले ठेकेदार इनकी टिकट की भी व्यवस्था नहीं करते।
जो लोग पेशगी की रकम नहीं लेते उनसे एक करारनामा पर दस्तखत करवाया जाता है जिसके तहत उन्हें 9 माह से 2 वर्ष तक लगातार काम करना पड़ता है। इन पलायनकर्ता मजदूरों की हिफाजत करने वाले कानून के नाम पर 1979 का अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिककानुन के नाम पर एक तात्कालिक प्रावधान के अलावा कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं इस कानून के तहत मजदूरी के अतिरिक्त ठेकेदारों को गन्तव्य तक को रेल भाड़ा देने की बाध्यता है। जिसका पालन सिर्फ कुछ पंजीकृत बड़े ठेकेदार ही करते है। अधिकांश श्रमिक अपने ही खर्च पर यात्रा करते है या यह रकम उनकी मजदूरी से काट ली जाती है। एक बार इन श्रमिकों के नागपुर, दिल्ली, पठानकोट या अन्य गंतव्य स्थान पर पहुँच जाने बाद इन्हें कैंपनुमा झुग्गियों में रखा जाता है, जहां सिरदारों के नियंत्रण में ही रहना और काम करना होता है। अधिकांश कैम्प की झुग्गियों का किराया भी इन मजदूरों की मजदूरी से ही काट लिया जाता है।
सामाजिक स्थिति
प्रवासी पुरूष और महिला श्रमिकों की कामकाजी जिंदगी और सामाजिकता पर जमादार अथवा सिरदार का पूरा निंयत्रण होता। इस नियंत्रण के लिये उसे ठेकेदार की तरफ और कमीशन के अलावा अतिरिक्त भुगतान किया जाता है। कैंप में प्राय 40-50 परिवारों के लिए एक लम्बी चालनुमा झुग्गी होती है जिसमें एक ही स्रोत से पानी लेना होता है। स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए प्रबंध करने का दायित्व कानुनन ठेकेदारों का होता है पर इस कानुन की सर्वथा, सर्वत्र अवहेलना ही की जाती है।
जिन गावों से अधिक पलायन होता है उनका अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हुआ कि उन गाँवों के मजदूर प्रायः 10-15 वर्षों तक परदेस में कमा लेने के बाद ही वापस अपने गांवो मे आकर बसते है। कई ऐसे भी उदाहरण मिले जहां बच्चों के जवान होने पर अपनी जगह उन्हें काम पर लगाकर ही लोग वापस आते है और यह सिलसिला पुश्त-दर-पुश्त चलता है। माता-पिता के बाद पुत्रों द्वारा उनकी जगह काम करने की परम्परा पहले झरिया-धनबाद कोयला खदानों तथा जूट मिलों में कमाने वालों के बीच थी। कैंम्प की झुग्गियों में सामाजिकता प्रायः अपने मूल गांव की तरह ही कायम रहती है क्योंकि एक गांव प्रवासी परिवार प्रायः एक ही स्थान पर काम करते है। एक ही स्थान पर रहते हैं। जब तक प्रवासी श्रमिक परिवार परदेश में रहते है उनका संबंध अपने गांव से बना रहता है, क्योंकि किसी न किसी व्यक्ति का गांव से आना-जाना होता ही रहता है। शादियां प्रायः साल दो साल पर गांव में आकर ही की जाती है। जब वे भ्रमण अथवा छुट्टी की मानसिकता लेकर आते है। लम्बे समय तक बाहर रहने पर भी अपनी जाति अथवा सम्प्रदाय के बाहर वैवाहिक संबंध प्राय) नहीं होते।
उत्तर प्रदेश की ईट भट्ठों मे प्रायः छत्तीसगढ़ के कुल प्रवासी मजदूरों का 50 फीसदी रहता है। यहां की स्थिति शायद सबसे दयनीय है, जहां श्रमिकों को युद्धबंदी की तरह रहता होता है। बाजार इनकी पहुंच से परे होते है, पर पगारके दिन खासतौर पर धमतरी के मजदूरों के लिए कुछ हाट लगाये जाते है, जहां हर चीज अपना-अपना बढ़ी हुई कीमतों पर बेची जाती है। (स्रोत परमानंद एवं उर्मिला बारीक नामक प्रवासी महिला श्रमिकों से साक्षात्कार) यहां का पूरा माहौल अविश्वास पर आधारित है, जहां से हर श्रमिक कम से कम अपने जीवन में एक बार धोखाधड़ी से लुटने की कहानी लेकर ही वापस आता है। कई कहानियों तो पारम्परिक विश्वसघात की कहानियों को भी मात देवी है। ऐसा ही एक अनुभव बघोरा जिला धमतरी की भक्तिन बाई ने भी बताया। वह अपने पति की मृत्यु के बाद अकेली ही कमाने गई थी। दो महीने तक काम करने के बाद उसे उसकी पगार शाम के वक्त इस हिदायत के साथ दी गई कि वह उसे हिफाजत से रखे। उसने हिफाजत के लिए पेस सुबह तक सरदार के पास रखवा दिया। सुबह उठकर उसने देखा कि उसके पैसे लेकर उसका सरदार फरार हो चुका था।