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रायपुर(कुम्हारी) :- कुम्हारी राज पटेल समाज ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मां शाकंभरी जयंती धूमधाम से मनाया। पटेल समाज द्वारा शाकंभरी जयंती के अवसर पर समाज के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे। समाज के लगभग 1000 से अधिक सदस्य ने इसमें बड़ चढ़ कर हिस्सा लिया। समाज के सभी सदस्य माता बहने तथा बच्चो सहित पुरुष वर्गो की इसमें भागीदारी रही।सुबह से ही मां शाकंभरी की पूजा अर्चना कर धूमधाम से शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा माँ शाकम्भरी भवन वार्ड क्रमांक 3 पटेल पारा से शुभारंभ हुआ और महामाया पारा, सब्जी मंडी, बाजार चौक , गणेश चौक ( लटटी बावा) ,बजरंग चौक पुरानी हटरी , मां शीतला मंदिर में पूजा अर्चना के बाद शोभायात्रा पुनः वापस पटेल पारा शाकम्भरी भवन आया ।
इसके बाद पंडित राजेश शुक्ला के द्वारा हवन पूजन का कार्य सम्पन्न हूवा। तत्पश्चात भंडारा का कार्यक्रम था जिसमे समाज के लोग तथा नगरवासियों ने हिस्सा लिया उक्ताशय की जानकारी रंजीत पटेल जी द्वारा दी गई।
मां शाकंभरी की धार्मिक कथा :-
महाभारत के वनपर्व के अनुसार शाकम्भरी देवी ने शिवालिक पहाडियों मे सौं वर्ष तक तप किया था महीने के अंतराल मे एक बार शाकाहारी भोजन का आहार करती थी। उनकी कीर्ति सुनकर ऋषि- मुनि उनके दर्शन को आये। देवी ने उनका स्वागत भी शाक से ही किया तभी वह शाकंभरी के नाम से जाने जाने लगी । इसका अर्थ यह है की देवी केवल शाकाहारी भोजन का भोग ही ग्रहण करती है। स्कंदपुराण के अनुसार यमुना के पूर्व भाग में सूर्य कुंड है यहां पर विष्णु कुण्ड और बाणगंगा सरीखें तीर्थ विराजमान है। पूर्व काल में यहां भगवान विष्णु ने रुद्र को प्रसन्न करने के लिए तप किया था।
इसके दक्षिण भाग में शाकम्भरी देवी विराजमान है जो श्रेष्ठ और सर्व कामेश्वरी हैं। यहां पर शाकेश्वर महादेव प्रत्यक्ष सिद्धिदायक हैं। प्राचीन काल में 100 वर्षों वाले अकाल या युद्ध में अपने अंगों से उत्पन्न विशेष प्रकार के शाक द्वारा देवी ने भरण पोषण कराया था। इसलिए वे शाकंभरी के नाम से विख्यात हुई यह देवी प्रत्यक्ष सिद्धिदात्री और दर्शन से ही पाप नाश करने वाली हैं।
एक अन्य दंत कथा के अनुसार पार्वतीजी ने शिवजी को पाने के लिए कठोर तपस्या की। उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया था तथा जीवित रहने के लिए केवल शाक सब्जियां ही खाईं। इसलिए उनका नाम शाकंभरी रखा गया।
देवी भागवत के अनुसार जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, तब मनुष्यों को कष्ट उठाते देख मुनियों ने मां से प्रार्थना की। तब शाकम्भरी के रूप में माता ने अपने शरीर से उत्पन्न हुए शाकों के द्वारा ही संसार का भरण-पोषण किया था। इस तरह देवी ने सृष्टि को नष्ट होने से बचाया।